राजेन्द्र सिंह गहलोत 'स्वत़़ंत्र पत्रकार'
जयपुर । मैं टी.वी. पर फिल्म देख रहा था 'नायक', जिसमे अनिल कपूर जर्नलिस्ट होता है और वह देखता है कि अमरीशपुरी जो चीफ मिनिस्टर का किरदार निभा रहा होता है वह वोटों का गणित बिठाने की जुगत में शहर में होने वाले संभावित दंगों को नहीं रोकने का पुलिस को आदेश देता है और पूरा शहर दंगों की आग में झुलस जाता है।
जब जर्नलिस्ट चीफ मिनिस्टर का लाइव इंटरव्यू लेता है और चीफ मिनिस्टर को संभावित दंगों को नहीं रोकने के लिये जिम्मेदार ठहराता है, तो चीफ मिनिस्टर जर्नलिस्ट को कुत्ता तक बोल देता है और कहता है 'तुम रिपोर्टर लोग बस कुत्तों की तरह भौकते हो, गाड़ी के पीछे-पीछे भागते हो।
खिसियाया हुआ चीफ मिनिस्टर जर्नलिस्ट को एक दिन का चीफ मिनिस्टर बनने का चैलेन्ज देता है और एक दिन का चीफ मिनिस्टर बनकर जर्नलिस्ट जो काम करता है तो वोटों की राजनीति नहीं होने के कारण शहर दंगों की आग में नहीं जलता, वरन चीफ मिनिस्टर अपने गुंडों द्वारा एक दिन के चीफ मिनिस्टर बने जर्नलिस्ट पर ही हमला करवा देता है।
यह कहानी मुझे इसलिये याद आई कि 'राम' का नाम लेने से पूरा देश धूं-धूं कर जल गया था और उस समय पुराने लोग आपसी सम्बोधन में 'राम-राम' भी नहीं बोलते थे कि सत्तानशीनों की कारगुजारियों के कारण कुछ गलत हो जाये तो इसका जिम्मेदार उन्हें नहीं ठहरा दिया जाये। आज मैंने एक मुस्लिम बहुल इलाके से कांवड़ गुजरते देखी, कांवड़ में डी.जे.के साथ 'जय श्री राम' के जयकारे भी लग रहे थे, और किसी भी धर्मावलम्बी को किसी तरह की कोई आपत्ति नहीं थी, बल्कि वह दूसरे के धर्म का सम्मान कर गौरवान्वित हो रहे थे।
फिर सवाल पैदा हुआ कि देश धूं-धूं कर जला उसका जिम्मेदार कौन था ? वोटों की गणित बिठाने की जुगत में सत्ता में बैठे मुख्यमंत्री ? या जिन रिपोर्टर को सच्चाई उजागर करने के लिए मुख्यमंत्री द्वारा कुत्ता तक कह दिया जाता है, वोट डालने वाले दिन के, एक दिन के मुख्यमंत्री ?
सवाल का जवाब किससे लूँ, क्योंकि सत्ता की नजर में रिपोर्टर तो भौकने वाला कुत्ता है, और इस देश की जनता मौन है, क्योकि उसका परिवार है, बच्चें है, वह शरीफ आदमी हैं उसे बच्चे पालने है, किसी लफड़े में नहीं पड़ना।
जयपुर । मैं टी.वी. पर फिल्म देख रहा था 'नायक', जिसमे अनिल कपूर जर्नलिस्ट होता है और वह देखता है कि अमरीशपुरी जो चीफ मिनिस्टर का किरदार निभा रहा होता है वह वोटों का गणित बिठाने की जुगत में शहर में होने वाले संभावित दंगों को नहीं रोकने का पुलिस को आदेश देता है और पूरा शहर दंगों की आग में झुलस जाता है।
जब जर्नलिस्ट चीफ मिनिस्टर का लाइव इंटरव्यू लेता है और चीफ मिनिस्टर को संभावित दंगों को नहीं रोकने के लिये जिम्मेदार ठहराता है, तो चीफ मिनिस्टर जर्नलिस्ट को कुत्ता तक बोल देता है और कहता है 'तुम रिपोर्टर लोग बस कुत्तों की तरह भौकते हो, गाड़ी के पीछे-पीछे भागते हो।
खिसियाया हुआ चीफ मिनिस्टर जर्नलिस्ट को एक दिन का चीफ मिनिस्टर बनने का चैलेन्ज देता है और एक दिन का चीफ मिनिस्टर बनकर जर्नलिस्ट जो काम करता है तो वोटों की राजनीति नहीं होने के कारण शहर दंगों की आग में नहीं जलता, वरन चीफ मिनिस्टर अपने गुंडों द्वारा एक दिन के चीफ मिनिस्टर बने जर्नलिस्ट पर ही हमला करवा देता है।
यह कहानी मुझे इसलिये याद आई कि 'राम' का नाम लेने से पूरा देश धूं-धूं कर जल गया था और उस समय पुराने लोग आपसी सम्बोधन में 'राम-राम' भी नहीं बोलते थे कि सत्तानशीनों की कारगुजारियों के कारण कुछ गलत हो जाये तो इसका जिम्मेदार उन्हें नहीं ठहरा दिया जाये। आज मैंने एक मुस्लिम बहुल इलाके से कांवड़ गुजरते देखी, कांवड़ में डी.जे.के साथ 'जय श्री राम' के जयकारे भी लग रहे थे, और किसी भी धर्मावलम्बी को किसी तरह की कोई आपत्ति नहीं थी, बल्कि वह दूसरे के धर्म का सम्मान कर गौरवान्वित हो रहे थे।
फिर सवाल पैदा हुआ कि देश धूं-धूं कर जला उसका जिम्मेदार कौन था ? वोटों की गणित बिठाने की जुगत में सत्ता में बैठे मुख्यमंत्री ? या जिन रिपोर्टर को सच्चाई उजागर करने के लिए मुख्यमंत्री द्वारा कुत्ता तक कह दिया जाता है, वोट डालने वाले दिन के, एक दिन के मुख्यमंत्री ?
सवाल का जवाब किससे लूँ, क्योंकि सत्ता की नजर में रिपोर्टर तो भौकने वाला कुत्ता है, और इस देश की जनता मौन है, क्योकि उसका परिवार है, बच्चें है, वह शरीफ आदमी हैं उसे बच्चे पालने है, किसी लफड़े में नहीं पड़ना।

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