बुधवार, 4 मार्च 2020

महान निष्क्रियता का दौर

प्रबंधन के कई गुरु बताते हैं कि फैसला नहीं करना भी एक किस्म का फैसला होता है। प्रबंधन गुरुओं के यह ज्ञान देने से बहुत पहले 1991 में देश के तब के प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने इस गुरु मंत्र को अपनाया था। उन्होंने सरकार बनाने के चंद दिनों के बाद ही देश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से बदल देने वाले फैसले किए और उसके बाद चुप होकर बैठ गए। उन्होंने चुपचाप अंदर-अंदर उस फैसले के अनुरूप काम होने दिया यानी उन पर अमल होने दिया। उनकी चुप्पी और फैसला नहीं करने का नतीजा यह हुआ कि राजनीतिक विवाद नहीं खड़ा हुआ, उनकी अल्पमत सरकार के सामने संकट नहीं आया और उनकी योजनाओं पर अमल हो गया। 

जिस समय नरसिंह राव फैसला नहीं करने की नीति के हिसाब से काम कर रहे थे उसी समय देश में न्यायिक सक्रियता का दौर आया था, जो करीब दो-ढाई दशक तक चला। न्यायिक सक्रियता के इस दौर में अदालतों ने हर मसले पर फैसले सुनाए, इसी दौर में जजों की नियुक्ति और तबादले के लिए कॉलेजियम सिस्टम बन गया और न्यायपालिका का दखल हर क्षेत्र में बढ़ा। माना गया कि केंद्र में कमजोर सरकारों की वजह से न्यायपालिका को अपनी ताकत बढ़ाने का मौका मिला। यह भी कहा जाने लगा कि विधायिका और कार्यपालिका दोनों अपनी साख गंवा रहे हैं, उन पर से लोगों का भरोसा खत्म हो रहा है और एकमात्र उम्मीद अदालत बची है।

यह महज संयोग है कि 30 साल के बाद केंद्र में मजबूत सरकार लौटी और न्यायिक सक्रियता सीमित होनी शुरू हो गई। हालांकि धर्म से लेकर परिवार और कारपोरेट से लेकर कानून तक के मामले में कई अदालती फैसले आए हैं पर ये फैसले हर बार आश्चर्यजनक रूप से मौजूदा सरकार के फैसलों और सत्तारूढ़ दल की नीतियों के अनुकूल रहे हैं। न्यायिक सक्रियता का फायदा भी सरकार उठा रही है और अब न्यायिक निष्क्रियता का फायदा भी सरकार को ही मिलता दिख रहा है। कम से कम दो मामलों में ऐसा दिख रहा है।

दिल्ली हाई कोर्ट के जज एस मुरलीधर ने एक दिन भड़काऊ भाषण के वीडियो क्लिप देखे और भाजपा के चार नेताओं पर मुकदमा दर्ज करके अगले दिन रिपोर्ट देने को कहा। पर उसी दिन रात में उनके तबादले पर मुहर लग गई। अगले दिन नई बेंच ने मुकदमा सुना और दिल्ली पुलिस को मुकदमा दर्ज करने के लिए एक महीने का समय दे दिया। अदालत ने तय किया कि वह डेढ़ महीने बाद इस पर सुनवाई करेगी क्योंकि अभी सुनवाई के लिए सही समय नहीं है। ध्यान रहे भड़काऊ भाषणों की वजह से दिल्ली के चुनाव में ध्रुवीकरण हुआ और बाद में दिल्ली में दंगे हुए। इस समय भी दिल्ली में संशोधित नागरिकता कानून के मसले पर धरने-प्रदर्शन चल रहे हैं और अगर भड़काऊ भाषण देने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं होती है तो फिर ऐसे भाषणों और दंगों की पुनरावृत्ति रोकना संभव नहीं है। इस समय कार्रवाई की सख्त जरूरत है पर अदालत को लग रहा है कि यह कार्रवाई का सही समय नहीं है।

शाहीन बाग के मामले में भी ऐसा ही हुआ। पिछले 80 दिन से लोग सड़क घेर कर बैठे हैं, जिससे लाखों आम लोगों को परेशानी हो रही है। फिर भी पहले न्यायपालिका ने प्रशासन से कहा कि वह बातचीत के जरिए सड़क खाली कराए। फिर अदालत ने वार्ताकार नियुक्त किए। एक हफ्ते में जब वार्ताकारों की रिपोर्ट आ गई तो दिल्ली के दंगों के हवाले अदालत ने इस पर कोई निर्देश देने की बजाय कहा कि अभी सही समय नहीं है। क्या अब अदालती कार्रवाई सही समय का इंतजार करेगी? लोगों का मूड देख कर और समाज का माहौल देख कर न्यायपालिका निर्णय सुनाएगी? फैसले टालने के ऐसे बहाने तो सरकारें करती रही हैं और उनको जवाबदेह बनाने की जिम्मेदारी अदालतों पर होती है।

ऐसा ही निष्क्रिय रवैया देश की सर्वोच्च पंचायत भारतीय संसद का है। सारी दुनिया में भारत की राजधानी दिल्ली में हुए दंगों पर चर्चा हो रही है। दुनिया के एक दर्जन देशों ने संशोधित नागरिकता कानून को लेकर सवाल उठाए हैं। अब तो संयुक्त राष्ट्र संघ की एक संस्था सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गई है। पर सरकार दिल्ली के दंगों पर संसद में चर्चा के लिए तैयार नहीं है। स्पीकर ने बताया है कि सरकार होली के बाद इस पर चर्चा चाहती है। क्या सरकार को भी लग रहा है कि इस समय चर्चा के लिए माहौल सही नहीं है? अब तक तो ऐसा होता रहा है कि समाज का जो सबसे ज्वलंत मुद्दा होता था उस पर संसद में चर्चा होती थी। अब सरकार ने इस परंपरा को बदलते हुए तय किया है जो सबसे ज्वलंत मुद्दा होगा उस पर चर्चा नहीं होगी। ऐसा लग रहा है कि सरकार को नागरिकता मसले पर जो फैसला करना था, वह कर दिया उसके बाद कोई फैसला नहीं करने की नीति पर चुपचाप बैठी हुई है।

ऐसी ही महान निष्क्रियता चौतरफा दिख रही है। शासन के सारे अंग अपने फैसले टाल रहे हैं। सरकार के विधायी और कार्यकारी फैसले अटके हुए हैं। लोकपाल की नियुक्ति के महीनों बाद अभी तक उसका कामकाज शुरू नहीं हुआ है। केंद्रीय सतर्कता आयुक्त और केंद्रीय सूचना आयुक्त की नियुक्ति की अधिसूचना जारी होने में अरसा गुजर गया। आर्थिकी से जुड़े सुधार और दूसरे अहम फैसले महीनों, बरसों से लंबित हैं। ऐसा लग रहा है कि सरकार ऑटो पायलट मोड में चली गई है। उसने टेकऑफ करा दिया है और अब सब कुछ अपने हिसाब से चलता रहेगा। फिर जब लैंडिंग की बारी आएगी यानी लोकसभा का चुनाव आएगा तब देखा जाएगा। तब तक उसके किए फैसले पर बहस होती रहे, अंदर अदर उस पर अमल होता रहे और समाज में ध्रुवीकरण चलता रहे।

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