कांग्रेस पार्टी ने बड़ा कंफ्यूजन बनाया है। किसी को समझ में नहीं आ रहा है कि कांग्रेस पार्टी भाजपा और नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए लड़ रही है या प्रादेशिक क्षत्रपों से लड़ कर पिछले कुछ दशकों की राजनीति में खोई हुई अपनी जमीन हासिल करने के लिए लड़ रही है?
दो-तीन अपवादों को छोड़ कर कांग्रेस पूरे देश में प्रादेशिक क्षत्रपों से लड़ रही है। पार्टी के दिल्ली में बैठे नेता कह रहे हैं कि प्रदेश कांग्रेस कमेटियों के कहने पर कांग्रेस पार्टी राज्यों में अकेले लड़ने का फैसला कर रही है तो राज्यों के नेता कह रहे हैं कि दिल्ली से फैसले हो रहे हैं कि हर सीट पर चुनाव लड़ना है। इस कंफ्यूजन में कांग्रेस ने हर जगह मोर्चा खोल दिया है।
उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के ज्यादातर बड़े नेता चाहते थे कि कुछ कम सीटें लेकर ही सपा, बसपा गठबंधन में लड़ा जाए। वहां अकेले लड़ने का फैसला हुआ तो वह कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के कारण हुआ। प्रियंका गांधी वाड्रा को सक्रिय राजनीति में उतार कर उत्तर प्रदेश में प्रभारी बनाना प्रदेश कमेटी की मांग नहीं थी, बल्कि सोनिया और राहुल गांधी ने यह फैसला किया। सपा और बसपा से तालमेल नहीं करने का असर यह हुआ है कि उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा आदि सभी राज्यों में बसपा अलग राजनीति कर रही है। कुछ जगह उसने सपा से तालमेल भी किया है।
इसी तरह कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में न तो ममता बनर्जी के साथ तालमेल किया और न लेफ्ट पार्टियों के साथ। वह दोनों के खिलाफ लड़ रही है। तभी प्रदेश और केंद्र में भी कांग्रेस के नेता मान रहे हैं कि पिछली बार कांग्रेस की जीती चार सीटें इस बार रिपीट नहीं होने वाली है। ले देकर अबू हाशिम खां चौधरी और अधीर रंजन चौधरी अपनी सीटों पर जीत सकते हैं। इस बार प्रणब मुखर्जी के बेटे अभिजीत मुखर्जी की सीट भी त्रिकोणीय लड़ाई के कारण मुश्किल में फंसी हुई दिख रही है।
असम में एआईयूडीएफ के नेता बदरूद्दीन अजमल ने कांग्रेस के प्रति सद्भाव दिखाया और अपनी जीती हुई तीन सीटों के अलावा बाकी सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ी। पर कांग्रेस ने अजमल की पार्टी की जीती हुई सीटों पर भी मजबूत उम्मीदवार उतार कर उनको उलझा दिया है। सीपीएम ने पार्टी कांग्रेस में कांग्रेस के साथ रणनीतिक अंडरस्टैंडिंग का फैसला किया था। सीताराम येचुरी ने बड़ी मुश्किल से यह फैसला कराया था। पर सीपीएम से अंडरस्टैंडिंग की बजाय कांग्रेस ने बंगाल के बाद केरल में भी उसे मुश्किल में डाल दिया। खुद राहुल गांधी वहां चुनाव लड़ने पहुंच गए। ओड़िशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गोवा, दिल्ली, हरियाणा आदि राज्यों में भी कांग्रेस ने किसी के साथ तालमेल करने की जरूरत नहीं समझी। और अब राहुल गांधी कह रहे हैं कि चुनाव के बाद गठबंधन बन सकता है।

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