बुधवार, 3 अप्रैल 2019

कांग्रेस तरकश का हर तीर आजमा रही

इस बार कांग्रेस के एक से बढ़ कर एक महारथियों के चुनाव मैदान में आने से माहौल यह बन रहा है कि मोदी का जादू फीका पड़ रहा है। 
2014 से 2019 का चुनाव अलग है। खासतौर से कांग्रेस के लिए। 2014 में कांग्रेस चुनाव शुरू होने से पहले ही हार मान चुकी थी। मगर इस बार कांग्रेस अपने सारे तुरुप के पत्ते इस्तेमाल करने के मूड में है। खुद पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी दक्षिण में कांग्रेस को मजबूत करने के लिए अमेठी के साथ केरल के वायनाड से भी चुनाव लड  रहे हैं। यह कांग्रेस अध्यक्षों की परंपरा है कि दक्षिण भारत को समान महत्व देने के लिए वे दक्षिण से भी चुनाव लड़ते थे। सोनिया गांधी बेल्लारी से और इंदिरा गांधी चिकमंगलूर से चुनाव लड़ीं और जीती हैं।

गुजरात जहां से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अपना पहला लोकसभा चुनाव लड़कर पूरे राज्य को फिर से भाजपामय करने की कोशिश कर रहे हैं वहीं से कांग्रेस दो साल पहले हुए राज्यसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को करारी शिकस्त देते हुए राज्यसभा जीतने वाले अहमद पटेल को लोकसभा चुनाव लड़ाने का बड़ा फैसला ले सकती है। भरूच से अहमद पटेल ने 1977 में तब अपना पहला लोकसभा चुनाव जीता था जब खुद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और संजय गांधी चुनाव हार गए थे। आमतौर पर लोग अहमद पटेल को नेपथ्य से पार्टी के लिए काम करने वाले नेता के रूप में जानते हैं।

 मगर 77 की ऐतिहासिक लोकसभा विजय के बाद उन्होंने लगातार 1980 और 1984 के चुनाव भी जीते। 1989 के चुनाव में जब गुजरात से हर जगह से भाजपा की जीत की खबरें आ रही थीं तो उस समय के भाजपा के सबसे बड़े नेता लालकृष्ण आडवानी ने कहा था भरूच से तो हमारा जीतना मुश्किल है, अहमद भाई ही जीतेंगे। मगर उस समय आडवानी गलत साबित हुए और उनकी ही रथयात्रा के परिणामस्वरूप उपजे ध्रुवीकरण ने अहमद भाई को हरा दिया।

अहमद पटेल की तरह ही या कहें एक मायने में उससे भी मुश्किल 1977 का चुनाव कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने भी जीता था। 1977 के लोकसभा चुनाव में तो कांग्रेस दम से लड़ी थी। मगर लोकसभा हारने के बाद जब विधानसभा चुनाव हुए तो कांग्रेस बेदम थी। केन्द्र में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनते ही जनता पार्टी की सरकार ने राज्यों की कांग्रेसी सरकारों को भंग कर दिया। हताश नेताओं के साथ कांग्रेस को विधानसभा लड़ना पड़ा। ऐसे में जहां मध्य प्रदेश के ग्वालियर संभाग से कांग्रेस का बूरी तरह सफाया हो गया वहीं दिग्विजय सिंह ने राघौगढ़ से चुनाव जीत कर कांग्रेस का झंडा बुलंद बनाए रखा।

दिग्विजय सिंह ने अब मध्य प्रदेश की उस सीट से बीड़ा उठाया है, जहां से लगातार पिछले आठ चुनाव कांग्रेस हारी है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और मुख्यमंत्री कमलनाथ ने दिग्विजय सिंह से कांग्रेस के लिए राज्य की सबसे कठिन सीटों में से किसी पर चुनाव लड़ने को कहा था। और दिग्विजय ने यह चुनौती स्वीकार कर ली। वे उस भोपाल से चुनाव लड़ रहे हैं , जहां से कांग्रेस अंतिम बार 1984 में चुनाव जीती थी। दिग्विजय के चुनावी मैदान में आते ही भाजपा में खलबली मच गई। अभी तक भाजपा के नेताओं में भोपाल सीट पाने की होड़ लगी रहती थी। भाजपा के लिए भोपाल सबसे आसान सीट मानी जाने लगी थी। मगर मध्य प्रदेश की राजनीति के चाणक्य समझे जाने वाले दो बार के मुख्यमंत्री दिग्विजय के सामने आते ही भाजपा के वे सारे बड़े नेता भोपाल से कन्नी काटने लगे जो कल तक वहां अपना दावा ठोक रहे थे।

राजनीति माहौल की चीज होती है। 2014 में दक्षिण से अचानक वित्तमंत्री पी चिदम्बरम ने और उत्तर भारत से सूचना प्रसारण राज्य मंत्री मनीष तिवारी ने ऐलान कर दिया कि वे लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेगे। इस अप्रत्याशित घोषणा से देश भर में यह मैसेज चला गया कि कांग्रेस चुनाव हार रही है। मगर इस बार कांग्रेस के एक से बढ़ कर एक महारथियों के चुनाव मैदान में आने से माहौल यह बन रहा है कि मोदी का जादू फीका पड़ रहा है। कांग्रेस और विपक्ष मोदी को दोबारा सत्ता में आने से रोक सकते हैं।

इस माहौल को हवा देने में सबसे बड़ा योगदान दिया प्रियंका गांधी ने। अयोध्या के दौरे से ठीक पहले जब कार्यकर्ताओं ने उनसे बार बार रायबरेली से चुनाव लड़ने का इसरार किया तो उन्होंने हंसते हुए कहा कि “ वाराणसी से लड़ लूं? “ हालांकि अब कांग्रेसी इसके कई भाष्य कर रहे हैं कि यह मजाक में कही बात थी। मगर आश्चर्य जनक रूप से प्रियंका के इस परिहास भरे कथन पर भी भाजपा का कोई रिएक्शन नहीं आया है। यह भाजपा के हमेशा उबलते रहने वाले तेवरों के विपरीत बात है। मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने की बात करना तो दूर सोचने वालों तक को भाजपा के नेता, प्रवक्ता फौरन चुनौति देना शुरू कर देते हैं। मगर प्रियंका पर सब खामोशी बनाए बैठे हैं। इसका क्या मतलब हुआ?

मतलब साफ है। भाजपा बिल्कुल नहीं चाहती कि प्रियंका गांधी दोबारा बनारस का रूख भी करें। अभी गंगा में नौकायन करते हुए जब प्रियंका बनारस के अस्सी घाट पर उतरी थीं तो उनके स्वागत में जिस तरह लोग उमड़े उसने बता दिया कि अगर गंगा की बेटी मुकाबले में आ गईं तो फिर बड़ी मुश्किल हो जाएगी। बनारस से प्रियंका का लगाव पुराना है। 2014 के लोकसभा चुनाव में रायबरेली में मां सोनिया गांधी का चुनाव प्रचार संभाल रहीं प्रियंका ने इन पंक्तियों के लेखक से कहा था कि वे बनारस जाना चाहती हैं। लेकिन अगर मैं बनारस चुनाव प्रचार में चली गई तो बाकी लोगों को कैसे मना कर पाऊंगी। 1999 से अमेठी रायबरेली के चुनावों की जिम्मेदारी संभाल रहीं प्रियंका इन दोनों चुनावों क्षेत्रों के बाहर केवल एक बार ही चुनाव प्रचार के लिए निकली हैं। वह भी मां सोनिया के लिए। 1999 में जब सोनिया गांधी कर्नाटक के बेल्लारी से ‌भी चुनाव लड़ीं थीं तब प्रियंका उनके लिए रोड शो करने बेल्लारी गईं थीं। वह चुनाव सोनिया के खिलाफ सुषमा स्वराज ने लड़ा था और हारीं थीं।   

अब भाजपा बिल्कुल नहीं चाहती है कि उसकी तरफ से कोई ऐसा प्रोवोकेशन हो कि प्रियंका बनारस की तरफ निकल पड़ें। हालांकि प्रियंका ने अभी तक यह भी तय नहीं किया है कि वे 2019 का चुनाव लड़ेंगीं भी या नहीं। जिस तरह हर नेता सेफ सीट चाहता है उसी तरह प्रियंका के लिए सबसे सुरक्षित सीट रायबरेली की थी। मगर वहां उन्होंने खुद ही मां सोनिया गांधी की मान मनौव्वल करके उन्हें उनका अखिरी चुनाव लड़वाया। लेकिन जैसा कि प्रियंका को जानने वाले उनके निकटवर्ती लोग बताते है कि वे क्या फैसला लेने वाली हैं इसका पूर्वानुमान लगाना बहुत मुश्किल है। इसलिए कांग्रेसी उत्साहित है कि अगर मायावती और अखिलेश यादव की तरफ से कोई सकारात्मक पहल हुई तो प्रियंका बनारस पंहुच सकती हैं।

अगर कहीं ऐसा हो गया तो पूरे चुनाव का नरेटिव (माहौल) ही बदल जाएगा।  मोदी यह बिल्कुल नहीं चाहेंगे कि उन्हें चुनाव में प्रियंका का सामना करना पड़े। मोदी 2014 में प्रियंका की हाजिर जवाबी, तीखे तेवर और पैनी बातों से बड़ी मुश्किल से बचकर निकले थे। जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी जी की आदत है कि चुनाव के दौरान हमला करने में वे आगा पीछा नहीं सोचते हैं। ऐसे ही उन्होंने 2014 में प्रियंका को कम करके आंकते हुए कहा कि वह मेरी बेटी की तरह है। इस तरह की टिप्पणियों पर आमतौर पर लोग रिएक्ट नहीं करते हैं। मगर अमेठी रायबरेली में चुनाव प्रचार कर रहीं प्रियंका ने फौरन कहा कि मैं किसी की नहीं राजीव गांधी की बेटी हूं। इसी तरह मोदी ने कहा कि कांग्रेस सवा सौ साल की बुढ़िया है। जब प्रियंका से इस बयान पर प्रतिक्रिया मांगी गई तो टीवी कैमरों के सामने खड़ीं प्रियंका ने हंसते हुए कहा कि क्या मैं बुढ़िया लगती हूं?

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