शुक्रवार, 8 मई 2020

श्रेय मोदी को, ठीकरा राज्यों पर

ऐसा कमाल सिर्फ भारत में हो सकता था और तभी सिर्फ भारत में ही हो रहा है। कोरोना वायरस के संक्रमण से लड़ाई में जो अच्छा है उसका श्रेय तो केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाता है लेकिन जो भी कमी है, गड़बड़ी है उसका ठीकरा राज्यों पर फोड़ा जा रहा है। वह भी खासतौर से विपक्षी पार्टियों वाले राज्यों की सरकारों पर। भले अपनी पार्टी के शासन वाले राज्यों कोरोना की महामारी चौतरफा फैल रही हो पर उनके ऊपर सवाल नहीं उठाना है। कठघरे में सिर्फ विपक्षी पार्टियों के मुख्यमंत्रियों को खड़ा करना है। और हां, जहां तक संभव हो उनको राजनीति में भी उलझाए रखना है, चाहे उसके लिए कुछ भी करना पड़े, राज्यपाल के कार्यालय का ही इस्तेमाल क्यों न करना पड़े।

बहरहाल, पहले श्रेय और ठीकरा फोड़ने का खेल समझें। आबादी के अनुपात में और कोरोना वायरस का संक्रमण शुरू होने की सूचना देने वाले पहले केस की तारीख के हिसाब से भारत में कम मामले हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है। भारत में पहला केस 30 जनवरी को आया और भारत की आबादी 130 करोड़ है। फिर भी तीन महीने आठ दिन बाद भारत में कोरोना संक्रमण का मामला 56 हजार से ज्यादा पहुंचा है। यह संख्या कम है तो इसका समूचा श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया जा रहा है। वे खुद कई बार यह श्रेय ले चुके हैं और बचा-खुचा काम उनकी पार्टी का आईटी सेल और सोशल मीडिया में उनके लंगूर कर रहे हैं। उनके हिसाब से दुनिया ने लोहा मान लिया है कि प्रधानमंत्री मोदी के कारण यह चमत्कार है। वे इसके लिए भगवान को धन्यवाद दे रहे हैं कि आज देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं।  

हालांकि यह विचार नहीं किया जा रहा है कि इस संख्या को कम रखने के लिए देश को कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है और न इस पर विचार किया जा रहा है कि कब तक संख्या को काबू में रखा जा सकेगा। हकीकत है कि सरकार देश की जनता को वायरस से सौ जूते भी खिला रही है और सौ प्याज भी खिला रही है। संख्या कम रखने के लिए जब देश में चार सौ से भी कम मामले थे तभी पूरे देश में लॉकडाउन कर दिया गया और पुलिस को खुली छूट दे दी गई कि जैसे भी हो लोगों को घरों से निकलने से रोका जाए। इसमें संदेह नहीं है कि इसकी वजह से संक्रमण की रफ्तार घट गई। पर चार घंटे के नोटिस पर किए गए लॉकडाउन का नतीजा यह निकला कि शहरों और महानगरों की झुग्गी झोपड़ियों और कच्ची बस्तियों में अंदर-अंदर नासूर की तरह कोरोना फैलता रहा। आज अहमदाबाद, इंदौर, मुंबई, दिल्ली आदि शहरों की जो दशा है वह इसी का नतीजा है कि बिना सोचे समझे सब कुछ बंद किया गया। जिस समय मामले कम थे उस समय बड़े शहरों और महानगरों को खाली कराया गया होता तो आज यह स्थिति नहीं होती। पर उसके लिए केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करने की बजाय उलटे संख्या कम होने का श्रेय दिया जा रहा है।

सवाल है जब देश में संख्या कम है और उसका श्रेय प्रधानमंत्री को जाता है तो किसी राज्य या शहर में केसेज ज्यादा हैं तो उसकी जिम्मेदारी भी तो प्रधानमंत्री की ही बनती है! ऐसा तो नहीं हो सकता है कि संक्रमितों की संख्या 58 हजार ( कम टेस्ट से कम आंकड़े में) होने का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाए और उसी 56 हजार में से 18 हजार महाराष्ट्र में होने का ठीकरा उद्धव ठाकरे पर फूटे? या पश्चिम बंगाल, दिल्ली, तमिलनाडु में ज्यादा मामले टेस्ट से आ रहे हैं तो वहां के मुख्यमंत्री जानें! या तो इसे समग्रता में देखना होगा या टुकड़ों में देखना होगा। यह नहीं होगा कि देश का आंकड़ा प्रधानमंत्री का है और राज्यों का आंकड़ा उनका अपना है। अगर ऐसा करना है तो फिर सीधे ऐसे कह दिया जाए कि जिन सात राज्यों में कुल 80 फीसदी मामले हैं उनका जिम्मा प्रधानमंत्री का नहीं है और बाकी राज्यों में जहां 20 फीसदी मामले हैं, वह प्रधानमंत्री की वजह से है!

असल में कोरोना वायरस के संकट के समय में ही सारा फोकस झूठी बातों के प्रचार पर है। विपक्षी शासन वाले राज्यों को बदनाम करने पर है। अपनी जिम्मेदारी को लेकर सवाल से बचने का है। इस बात की जांच क्यों नहीं होनी चाहिए कि अहमदाबाद में इतने मामले आ रहे हैं तो कहीं उनके पीछे फरवरी के अंत में हुआ नमस्ते ट्रंप कार्यक्रम का हाथ तो नहीं है? यह सब जानते हैं कि लॉकडाउन से वायरस खत्म नहीं होता है, बल्कि उससे रफ्तार कम होती है और यह मौका मिलता है कि देश अपनी मेडिकल तैयारियों को दुरुस्त करें। क्या भारत में लॉकडाउन के 45 दिनों का इस्तेमाल मेडिकल तैयारियों को दुरुस्त करने के लिए हुआ है? रेलवे कोचेज को कोरोना मरीजों के लिए अस्पताल में बदलने के अलावा कोई ऐसा काम नहीं दिख रहा है, जिससे कहा जाए कि सरकार ने इस अवधि का सही इस्तेमाल किया है। टेस्टिंग किट से लेकर पीपीई किट्स तक का 90 फीसदी हिस्सा भारत आयात कर रहा है। इनकी खरीद में कैसी गड़बड़ियां हो रही हैं, यह भी सबने देखा है। या तो किट्स खराब हैं या बहुत ज्यादा महंगी हैं।

दुनिया ने देखा कि कैसे चीन ने दस दिन में वुहान में अस्थायी अस्पताल बना कर खड़ा कर दिया। क्या भारत में कहीं दिखा है कि सरकार ने अस्थायी अस्पताल खुलवाए? उलटे जो पहले से चल रहे निजी अस्पताल थे वे बंद हो गए। उनकी ओपीडी बंद हुई और ऑपरेशन थिएटर भी बंद कर दिए गए। कोरोना से इतर दूसरी बीमारियों वाले मरीजों को उनके हाल पर मरने के लिए छोड़ दिया गया। इलाज के लिए अस्पतालों में भरती मरीजों और क्वरैंटाइन में रखे गए लोगों की मुहंजबानी पता चल रहा है कि इन जगहों की क्या हालत है। ज्यादातर जगहों पर टॉयलेट गंदे हैं, नल टूटे हुए हैं, पंखे नहीं चल रहे हैं, नलों में पानी लगातार नहीं आ रहा है, साबुन या डिसइन्फेक्टेंट ज्यादातर जगहों पर नहीं है, स्वास्थ्यकर्मियों के पास पीपीई किट्स नहीं हैं, वे हाथ और पैर में प्लास्टिक की थैलियां बांध कर काम कर रहे हैं और बावजूद ऐसे अधकचरे प्रबंध की बजाय केसेज कम होने का श्रेय प्रधानमंत्री को देने की हल्लेबाजी हुई। कोरोना से जंग जीत जाने याकि 18 दिन में महाभारत की तरह 21 दिन में कोरोना से जंग जीत लेने के मोदी के दावे में दीये, ताली-थाली बजवाने की नौटंकियां हुई। उसके बाद फिर देश के आम लोगों के त्याग, समर्पण, तपस्या, प्रार्थना, प्रतिबद्धता, अनुशासन आदि के दम पर 40 दिन में जंग जीत लेने का बिगुल बजा।यह तो  बुरा हो कोरोना वायरस का जो इतने कठोर लॉकडाउन और राष्ट्र के नाम इतने संबोधनों के बावजूद भी खत्म नहीं हुआ और उलटे फैलता जा रहा है।

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