नड्डाजी, मुझे पता है आपके सर्वेसर्वा मोदी-शाह है। बावजूद आज मैं विनती कर रहा हूं कि आप मोदी-शाह को भूल कर अपने मुंह से, अपनी कलम से, अध्यक्ष पद के अपने अधिकार से देश भर के भाजपा नेताओं से कहें कि वे वायरस के संकट में किसी विरोधी सरकार की आलोचना नहीं करें। सरकारों को अपना काम करने दें। ममता बनर्जी चाहे जो करें करने दें, उद्धव ठाकरे, उनके मंत्रियों, मुंबई महानगरपालिका के कमिश्नर प्रवीण परदेशी को वायरस से लड़ने दें! हां, नड्डाजी महामारी के वक्त में आप अपने नेताओं-कार्यकर्ताओं की लंगूरी राजनीति को रोक कर हिंदू राजनीति की लाज बचाएं। मोदी-शाह तो आने-जाने वाले चेहरे हैं। लेकिन दुनिया की कौमों में हिंदू राजनीति की लाज बचाना सनातनी हिंदू का आज सकंट है। नरेंद्र मोदी व उनकी सरकार को जो करना था, वह कर लिया, बचा-खुचा 2021 तक कर डालेंगे। लेकिन नड्डाजी आप भाजपा के सदर हैं। आप स्वास्थ्य मंत्री रहे हैं, आपको मालूम है भारत की चिकित्सा व अस्पतालों की हकीकत!जितना मैं आपको जानता-समझता हूं, आप सुधी-समझदार ब्राह्मण हैं और गौमूत्र-काढ़े से कोविड-19 वायरस को भारत से भाग गया हुआ या बुरा वक्त गुजर गया है, इस जैसी स्वास्थ्य मंत्रालय के बाबुओं की ब्रीफिंग के फेर में, धोखे में आप नहीं होंगे यह मेरा विश्वास है।
उम्मीद हैमेरा ऐसा सोचना सही होगा। तो ईश्वर के लिए भाजपाई लंगूरों, नेताओं को हिदायत दें कि वे महामारी के वक्त मौन रहें। मौन रहने की मास्क पहने रहें। अपने महासचिव कैलाश विजयवर्गीय को इस तरह की बयानबाजी से रोकें कि ममता बनर्जी को पद पर बने रहने का अधिकार नही है। वो तुंरत इस्तीफा दें। या देवेंद्र फड़नवीस और नीतेश राणे की यह बयानबाजी व ट्विटरबाजी कि – शर्म करो उद्धव सरकार! क्या मुंबइकरों का कोई रखवाला नहीं बचा? कैसे संक्रमित मरीजों के पास अस्पताल में शव रखे हुए थे? सायन अस्पताल में मरीज शवों के पास सो रहे हैं। ये हद है। ये किस तरह का प्रशासन है। बहुत बहुत बहुत शर्मनाक।
नड्डाजी, लाशों पर राजनीति करने का अभी वक्त नहीं है! आखिर यों भी भारत राष्ट्र-राज्य की सत्ता उनकी पार्टी के प्रधानमंत्री के हाथों में है। आने वाले वक्त में जब चौतरफा शर्म-शर्म बनेगा तब क्या होगा। ध्यान रहे कोरोना वायरस की महामारी का इतिहास राजा नरेंद्र मोदी के नाम यह सब लिखवाए हुए होगा कि जब वे प्रधानमंत्री थे तो भारत में संक्रमितों का सबसे ऊंचा एवरेस्ट (ईश्वर करें मैं गलत साबित होऊं) बना और उसके असर में देश के अलग-अलग इलाकों में मौत की विन्ध्य, सतपुड़ा, अरावली जैसी पर्वतश्रेणियां (ईश्वर करें मैं गलत साबित होऊं) बनीं, जिसमें जिधर देखो उधर संक्रमित थे। इसलिए जब खतरा ऐसा है तो इतनी तो कृपा करवाएं कि मुंबई, महाराष्ट्र में जो मुख्यमंत्री, मंत्री, अफसर, अस्पताल ईमानदारी से टेस्टिंग के साथ वायरस को पकड़ कर अपनी जान पर खेलते हुए व अपने को देश में सर्वाधिक बदनाम बनवाने की जोखिम के बावजूद टेस्टिंग से लड़ाई लड़ रहे हैं उनका हौसला भले न बढ़ाएं लेकिन मौन रह कर वक्त पर फैसला छोड़ें कि इन्होंने लड़ाई सही लड़ी या गलत! इनका हौसला तोड़ कर इन्हें टेस्टिंग से भागे भाजपा के मुख्यमंत्रियों जैसा नहीं बनाएं!
नड्डाजी, आप देश की सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष हैं। इसलिए देशहित में छोटा सा यह सत्य मान लेना चाहिए कि केरल के विजयन, राजस्थान के गहलोत और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे ने अपनी-अपनी समझदारी में वायरस से लड़ने की जो रीति-नीति बनाई वहीं सही तरीका है। महाराष्ट्र-मुंबई-पुणे में संक्रमण-लाशों की संख्या भले लाखों में पहुंचे लेकिन यदि डब्लुएचओ की गाइडलाइन माफिक टेस्ट, ट्रेस, रिस्पोंस में उद्धव ठाकरे,स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे, बीएमसी कमिश्नर प्रवीण परदेशी डटे रहे तो करोड़ों में होने वाला संक्रमण लाखों में सिमटेगा। इसलिए पूरे देश को अभिनंदन करना चाहिए मुंबई के कमिश्नर परदेशी का जिसने टेस्टिंग, टेस्टिंग की ठानी हुई है और हिम्मत के साथ परसों उसने महानगर में अपने अधिकार से शराब की बिक्री रूकवाई ताकि भीड़ का तमाशा रूके। परदेशी की सूझबूझ को सलाम है, जो मुंबई के विशाल रेसकोर्स मैदान, गोरेगांव के प्रदर्शनी मैदान, स्टेडियम आदि को क्वरैंटाइन केंद्र, अस्पताल में कनवर्ट कराया और प्राईवेट अस्पतालों-डॉक्टरों को वायरस की लड़ाई में झोंका। इस सबकी तैयारी में आधा-अधूरापन देख मेरे मन में भी संताप हुआ कि एक तरफ न्यूयॉर्क, लंदन हैं, जहां ऐसे ही आपातकाल अस्पताल और सुविधाएं बनीं लेकिन क्या गजब जबकि अपने मुंबई की तस्वीरें! मगर ठाकरे और परदेशी भला क्या करें। दुनिया के सभ्य-समझदार देशों ने आर्मी से टेंपररी अस्पताल बनवाए, इलाज में, लाशों की ढुलाई का काम करवाया जबकि भारत की एक मोदी सरकार है, जिसे भारत की वित्तीय राजधानी मुंबई में ईमानदारी से लड़ी जा रही लड़ाई में सेना से अस्पताल, टेंपरेरी अरेंजमेंट बनवाने की समझ नहीं आई। और तो और मोदी के साथ सेनाओं के प्रमुखों ने भी लड़ाई शुरू होने से पहले ही फूल बरसाने के तमाशे में पचासों करोड़ रुपए बरबाद किए जबकि ये उसकी बजाय मुंबई-पुणे में छावनी, कैंप, इंजीनियरिंग-मेडिकल विंग के होते हुए रेसकोर्स मैदान आदि को अस्पताल बनानेमें मदद करते तो हजारों मरीजों की जान बचाने में सेना का भी योगदान बनता। महामारी के वक्त में फूल बरसाना चाहिए या सेना को मरीजों को लाश न बनने देने में मददगार होना चाहिए था?
नड्डाजी, आपसे अनुनय है, आग्रह है कि हिंदू राजनीति वाली पार्टी के अध्यक्ष के नाते हिंदुओं को कलंकित होने से बचाएं। जरा पूछें देवेंद्र फड़नवीस से कि यदि वे मुख्यमंत्री होते तो क्या तीर मार लेते? भाजपा की एक भी सरकार महाराष्ट्र की तरह टेस्ट, नहीं करा रही है? मोदीजी का गुजरात भी नहीं, जबकि वहां केतमाम लक्षण (मतलब मृत्यु दर, सामुदायिक संक्रमण, प्रवासी आबादी का दिनोंदिन अधमरा होते जाना) संकेत दे रहे हैं कि गुजरात और उसके महानगरोंमें वायरस भारी पसर चुका है और जो होगा वह अकल्पनीय (ईश्वर करें न हो, आखिर मोदी-अमित शाह का घर है) होगा। पर टेस्ट के बजाय छल, झूठ और आंखमिचौली से बताया जा रहा है सब तो ठीक है। ठीक उलटे मुंबई में बेबाकी है, सत्यता है। सायन के जिस अस्पताल में गुरुवार को बेड पर लेटेसंक्रमित मरीजों के बीच में काले प्लास्टिक के बैगों में कोरोना से जान गंवाए लोगों के शव पड़े दिखे वह धारावी झुग्गी-झोपड़ी के इलाके के लिए अस्पतालहैं। और सलाम अस्पताल के डीन व स्वास्थ्य मंत्री को जिन्होंने सत्यता से कहा अस्पताल में स्टाफ की कमी है तो रिश्तेदार लोग शवों को ले जाने के लिए नहीं आ रहे हैं। इसलिए इन्हें वार्ड में रखा गया। मॉर्चुरी में शेल्फ भरे हुए हैं। डीन (डॉ. प्रमोद इंगले)तो स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे का कहना था मृतकों के परिजन 30 मिनट के भीतर बॉडी ले जाते हैं। लेकिन, कई बार वे हिचकिचाते हैं। इसके बाद शव मॉर्चुरी में भेज दिया जाता है। सभी प्रोसीजर पूरे करने में वक्त लगता है। प्रोटोकॉल के तहत बॉडी को काली पॉलीथीन में लपेटा जाता है ताकि संक्रमण नाफैले।
सोचें एक तरफ मुंबई की धारावी जैसे झुग्गीझोपड़ इलाके में(दिल्ली या और किस महानगर में सामुदायिक संक्रमण की चिंता में ऐसी टेस्टिंग है? क्या गुजरात, यूपी, दिल्ली में है?क्या इन जगहों को रेड जोन बना कर वायरस को पकने देने का अवसर नहीं दिया जा रहा है?) घर-घर जा कर टेस्टिंग का साहस है।आबादी के अनुपात में छोटे अस्पताल में मरीज और मृतक की हकीकत को सत्यता से वहां स्वीकारा जा रहा है। तब सच्चाई के वीडियो से भाजपाइयों को वायरस से लड़ाई की गंभीरता बूझनी चाहिए या शर्मनाक कहते हुए यह राजनीति करनी चाहिए कि मुंबइकरों का क्या कोई रखवाला नहीं!
हां, नड्डाजी मैं भी विचलित हुआ मुंबई के सायन अस्पताल में संक्रमित रोगियों के साथ रखी हुई लाशों को देख कर। पर समझिए, समझाइए किकोविड-19 वायरस मरीज और लाश का साझा है। पलक झपकते वायरस मरीज की ऑक्सीजन को सोख कर उसे लाश में बदल देता है। मुंबई के ठाकरे, बीएमसी के परदेशी को धन्यवाद कीजिए कि ये टेस्टिंग से, मुंबई, सायन के अस्पताल में इंसान की वायरस से लड़ाई की वह झांकी दिखला दे रहे हैं जो आने वाले वक्त में मुझे, आपको, मोदीजी को भारत के कोने-कोने में दिखलाई देगी।
और नड्डाजी आपके फडनवीज, राणे की राजनीति ने आज परदेशी का तबादला करा दिया। उद्धव ठाकरे भी गच्चा खा कर समझदार, दमदार सेनापति का लडाई के अधबीच ट्रांसफर कर बैठे। पता नहीं मुंबई में अब आक्रामक टेस्टींग, लडाई लड़ी जाए या दिल्ली की तरह वहा भी वायरस दिखना बंद हो जाए। खैर नड्डाजी, ज्यादा न सोचें। सिर्फ हिंदू, देशहित में भाजपाइयों को आदेश दें कि सीखो-जानों केरल, महाराष्ट्र-राजस्थान से और मुंह पर बांधे रहो पट्टी व मास्क। धन्यवाद नड्डाजी! और हां आग्रह यह कि यह वायरस ससुरा बहुत खराब है। आप जरूर टेस्ट कराएं। हो सके तो नरेंद्र मोदी, अमित शाह को भी टेस्ट कराने की सलाह दे। आप लोगों को टेस्ट हर सप्ताह कराना चाहिए। जब डोनाल्ड ट्रंप रोजाना टेस्ट कराने लगे हैं तो भला आप लोगों को क्यों नहीं?काढ़े के भरोसे मत रहिएगा।जाने रहिए यह वायरस पुतिन की छप्पन इंची छाती में भी घुस चुका है।

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