भारत और दुनिया के सभ्य, विकसित और लोकतांत्रिक देशों में जमीन आसमान का फर्क है। यह फर्क सिर्फ भौतिक सुविधाओं यानी मेडिकल सुविधा, राशन-पानी की सुविधा, सामाजिक सुरक्षा आदि में ही नहीं है, बल्कि सरकारों की सोच में भी है। वहां की सरकारें कोरोना वायरस के संकट के दौर में अपने नागरिकों का जीवन, उनका रोजगार, उनका वेतन-भत्ता आदि बचाने के प्रयास कर रही हैं और इसके उलट भारत में सरकार अपने नागरिकों से पैसा लूटने की स्कीम लगा रही है। लोगों की मदद करने की बजाय सरकार लोगों से ही मदद मांग रही है। अमेरिका और यूरोपीय देशों में निजी कंपनियां, जिन लोगों को नौकरी से निकाल रही हैं या जिनका वेतन कम कर रही हैं, उन्हें सरकार भत्ता दे रही है और भारत में सरकार अपने कर्मचारियों के वेतन में भी कटौती कर रही है और भत्ता तो रोक ही दिया है। निजी कंपनियों के कर्मचारी तो सरकार का सरोकार है ही नहीं।
भारत सरकार ने केंद्रीय कर्मचारियों का महंगाई भत्ता रोक दिया है। उसकी देखा-देखी कई राज्य सरकारों ने ऐसा करना शुरू कर दिया है। केंद्रीय कर्मचारियों को बढ़ा हुआ महंगाई भत्ता इस साल जनवरी से लेकर अगले साल जून तक नहीं मिलेगा। डेढ़ साल तक इसे रोकने से भारत सरकार के 38 हजार करोड़ रुपए बचेंगे। अगर हर राज्य सरकार महंगाई भत्ता रोक देती है तो केंद्र व राज्यों का कुल मिला कर एक लाख दस हजार करोड़ रुपया बचेगा। इसी तरह केंद्र सरकार अपने कर्मचारियों का एक दिन का वेतन कोरोना के मद में काटने की बात कर रही है तो केरल सरकार ने कहा है कि वह छह दिन का वेतन काटेगी। एक दिन की वेतन कटौती से भी केंद्र सरकार का कोई 50 हजार करोड़ रुपया बचना है।
भारत में किस तरह से संकट के समय लोगों की मजबूरी का फायदा उठाया जाता है यह कोई सरकार से सीखे। भारतीय रिजर्व बैंक ने लोगों को राहत देने के नाम पर कहा कि वे तीन महीने तक अपने कर्ज की किश्तों का भुगतान चाहें तो नहीं कर सकते हैं। उन्हें तीन महीने तक किश्त नहीं भऱने पर डिफॉल्टर नहीं माना जाएगा और उनका सिबिल स्कोर भी प्रभावित नहीं होगा। इसके अलावा रिजर्व बैंक ने नीतिगत ब्याज दरों में 0.75 फीसदी की कमी भी कर दी। पर इसे देश के बैंकों ने कमाई का साधन बना लिया।
बहुत होशियारी से सिर्फ किश्तों को स्थगित करने की बात कही गई। उन पर लगने वाले ब्याज को लेकर कोई बात नहीं हुई। तभी अब यह स्थिति है कि कोई व्यक्ति अगर अपने दस साल के कर्ज की तीन किश्तें अभी नहीं चुकाता है तो अंत में उसे सात से दस अतिरिक्त किश्तें भरनी पड़ सकती हैं। इसी तरह कर्ज पर नीतिगत ब्याज दर घटने के तुरंत बाद बैंकों ने लोगों के जमा पर ब्याज घटा दिया। बुजुर्ग नागरिकों के लिए चलने वाली विशेष योजनाओं पर भी ब्याज दर कम किया गया और किसान विकास पत्र, पीपीएफ, फिक्स्ड डिपॉजिट और बचत खातों पर भी ब्याज दर कम किया गया। अनेक रिटायर हो चुके लोगों की आमदनी का साधन बैंकों में जमा पर मिलने वाला ब्याज है पर उसे लगभग खत्म कर दिया गया है। ज्यादातर जमा योजनाओं में ब्याज की दर मुद्रास्फीति की दर के बराबर या उससे कम है। पहले नोटबंदी से सरकार ने लोगों के पैसे बैंकों में पहुंचवा दिए और उसके बाद उन पर ब्याज खत्म कर दिया। बहरहाल, इस संकट के समय में एक तरफ जहां दुनिया भर की सरकारें अपने नागरिकों की मदद कर रही है, वहीं भारत में सरकार और सरकारी एजेंसियां नागरिकों का खून चूसने में लग गई हैं।

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