वायरस भारत और बाकी देशों का फर्क दस तरह से जाहिर कर रहा है। भारत मानसिक तौर पर, व्यवस्था के नाते, गरीबी, इलाज आदि की तमाम कसौटियों में कितना खोखला, जर्जर है इसके सबूत में इस चिंता पर जरा गौर करें कि कुछ भी हो आर्थिकी फिर चले। अमेरिका में जैसी जल्दी है तो भारत में भी है। लेकिन इसके बाद फिर फर्क है। अमेरिका क्यों आर्थिकी को रिओपन करना चाहता है? ताकि अमेरिका की अमीरी बची रहे। अब सोचें कि भारत, उसके प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सरकारें क्यों आर्थिकी को चालू कराना चाहती हैं? जवाब है ताकि सरकार भूखी नहीं मरे! नरेंद्र मोदी, केजरीवाल, शिवराज सिंह, ममता बनर्जी सब चिंता में हैं कि आर्थिकी शुरू हो तो सरकार को पैसा आए और सरकारी कर्मचारियों को वेतन दिया जा सके।
हां, भारत में सरकारें वेतन के लिए आर्थिकी चालू कराना चाहती हैं और शुरुआत शराब बेचने से, ट्रैफिक चलवा कर पेट्रोल-डीजल में कमाई से होगी। दूसरी तरफ अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस आदि में आर्थिकी को रिओपन करने की चिंता इसलिए नहीं है कि वहां सरकारों को अपने कर्मचारियों को वेतन देना है। वहां आर्थिकी को शुरू करने की चिंता इसलिए है ताकि देश की अमीरी, नागरिकों की अमीरी में गिरावट रूके। मुझे दुनिया में कहीं यह पढ़ने, वहां के टीवी चैनलों में सुनने को नहीं मिला कि वहां सरकारों को अपने कर्मचारियों के वेतन देने की समस्या है। सरकार भूखे मर रही है इसलिए आर्थिकी ओपन हो।
भारत में उलटा है। केंद्र सरकार हो या प्रदेश सरकारें सब अपनी भूख में मर रहे हैं। मतलब सरकारों को अपने खर्च, कर्मचारियों को तनख्वाह बांटने की चिंता है। जाहिर है भारत ने अपने को ऐसा बनाया है कि पूरी आर्थिकी सरकार की भूख मिटाने का जरिया है। कर्मचारियों की फौज इतनी बड़ी बनी हुई है कि महीने की तालाबंदी में ही सरकारों को अपने खर्चे, अपने कर्मचारियों की तनख्वाह के लाले पड़ गए।
सोचें भारत ने कौन सा अर्थशास्त्र अपना रखा है और दुनिया ने कौन सा, जो अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, सिंगापुर, ताईवान आदि देशों में आर्थिकी रूकने से सरकारी कर्मचारियों को वेतन देने का संकट नहीं है, बल्कि वे उलटे प्राइवेट कंपनियों, कॉरपोरेट को इस निर्देश के साथ अरबों-खरबों डॉलर बांट रहे हैं कि तालाबंदी है तो वे हमसे पैसा ले कर अपने कर्मचारियों को तनख्वाह दें। वे देश बेरोजगार हुए लोगों को हर सप्ताह गुजारा भत्ते का पैसा एकाउंट में ट्रांसफर कर रहे हैं, जबकि भारत में स्थिति है कि शराब बेच कर सरकारे खुद के कर्मचारियों के लिए वेतन के जुगाड़ में है। महीने भर की तालाबंदी में ही भारत में सरकारों को अपने कर्मचारियों, अपने खर्चे के लिए शराब बेचने से ले कर कर्ज-दान लेने के तमाम उपाय करने पड़े हैं ताकि सरकारें किसी तरह चलें!
सो, कितना खोखला और दिवालिया है भारत! भारत में सरकारों का पोर-पोर इस समय इस चिंता में है कि उसका खर्चा कहां से चलेगा! केंद्र सरकार और राज्यों की सरकारों को अपने खर्चे के लिए, अपने कर्मचारियों को वेतन देने के लिए आर्थिकी को शुरू कराना है। नरेंद्र मोदी, अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, शिवराज सिंह चौहान, अशोक गहलोत, उद्धव ठाकरे और उनके अफसर दिन रात चिंता में हैं कि यदि आर्थिकी नहीं चली तो वेतन का क्या होगा! ऐसे अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप, राज्यों के गवर्नर, ब्रिटेन की बोरिस जॉनसन सरकार चिंता में दुबली हुई नहीं पड़ी है।
तभी भारत के हर सुधी जन को इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि लोगों की जान की कीमत पर भारत में कौन अपने स्वार्थ में आर्थिकी को शुरू कराना चाह रहा है? जवाब है सरकार। क्यों? ताकि सरकार का पेट भरे! यह फर्जी बात है कि सरकार का पेट भरेगा तो गरीब का पेट भरेगा! मतलब कल-कारखाने चलेंगे तो गरीब का पेट भरेगा। आर्थिकी चलेगी तो गरीब चलेगा। इस फर्जी अर्थशास्त में 73 सालों से भारत में यह फर्जीवाड़ा चला हुआ है कि सरकार से गरीब का पेट भरता है। हकीकत उलटी है। गरीब के नाम पर सरकार अपना पेट भरती है और सालों साल मुटियाती गई है। मैं दक्षिणपंथी हूं, पूंजीवाद, निज उद्यम समर्थक हूं लेकिन भारत में सरकारों ने पूंजीवाद का क्रोनीवादी कचूमर बना कर उसे जैसा लूला-लंगड़ा बनाया है और गरीब-मजदूर के नाम पर टैक्स- इंस्पेक्टर राज में पूंजीवाद को जैसे जकड़ा है तो उसका नतीजा है कि जब महामारी आई है तो, जहां सरकार भूखी है, तो उद्योगपति-कल-कारखाने वेंटिलेटर के लिए तड़प रहे हैं। वहीं गरीब रोटी-चटनी बांध बाल बच्चों को लेकर मई की तपती धूप में पैदल घर की ओर निकला हुआ है!
उफ! 1947 में विभाजन के वक्त और शायद 1918 के प्लेग में भी भारत का गरीब ऐसे ही रोटी-चटनी बांध जान बचाने की सुरक्षा में पैदल भागा होगा, मरा-खपा होगा। मैं तब दहल गया जब मैंने पढ़ा- लॉकडाउन में रोजी-रोटी गंवा कर, जब सब जमा पूंजी खत्म हो गई, न पैसे बचे और न उनके पास बन रहे थे तो महाराष्ट्र से मध्य प्रदेश के अपने गांव जाने के लिए डेढ़ सौ मजदूरों का एक जत्था पैदल घर के लिए निकला। इनमें से 16 मजदूर आगे चलते-चलते 50 किलोमीटर पैदल चलने के बाद थक कर पटरियों पर सोए थे। उन्हें सुबह तड़के एक मालगाड़ी कुचलती हुई निकल गई। मजदूरों के साथ कुछ सूखी रोटियां और चटनी के पैकेट थे, जो दुर्घटना के बाद पटरियों पर बिखरे हुए थे।
सूखी रोटियां और चटनी! यहीं है भारत के 73 साला विकास, भारत तंत्र के मूर्खतापूर्ण अर्थशास्त्र, प्रधानमंत्रियों के कथित हार्डवर्क का लब्बोलुआब! कोविड-19 के वायरस ने भारत की विद्रूपताओं को जिस तरह नंगा किया है (अभी महीनों और जाहिर होगा) उससे आने वाले वक्त में भारत की कथित आर्थिकी पर यह सवाल भी उठना है कि है कहां भारत में आर्थिकी? गरीब के साथ जो हुआ है तो उसके श्राप में कहीं आर्थिकी ही ‘सूखी रोटी और चटनी आर्थिकी’ अंततः न हो जाए! हां, जैसा मैंने पिछले सप्ताह लिखा वह फिर दोहरा रहा हूं कि 130 करोड़ की आबादी में पांच-छह करोड़ उच्च-मध्य वर्ग, व सरकारी कर्मचारी, धन्ना सेठ-कॉरपोरेट के एक कुलीन-क्रोनी-दरबारी वर्ग को छोड़ें तो भारत के 124 करोड़ लोगों के सत्य का नया प्रतीक है सूखी रोटियां और चटनी। पांच-छह करोड़ लोग अपनी तनख्वाह, अपनी मलाई के लिए आर्थिकी चलाना चाहते हैं। और वह तब संभव है जब सूखी रोटी और चटनी वाले अपना खून पसीना बहाए। वे अपने घर नहीं जाएं। उन्हें मनाने, बरगलाने के लिए अभी दस तरह के झूठ बोले जा रहे हैं। प्रचार है घर गए लोग काम पर लौटना चाहते हैं। भूख उन्हें तड़पा रही है। सोचें, भारत के जो लोग सूखी रोटी और चटनी के साथ अप्रैल-मई की गर्मी में एक भय से सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल घर पहुंचे वे कुछ महीने घरों में सूखी रोटी-चटनी से क्या जी नहीं लेंगे? शहर से जब वे सूखी रोटी-चटनी ले कर लौटे हैं तो वापिस लौटने में भी तो उन्हे कुल जमा रोटी-चटनी ही मिली है।
गरीबी का यह मंजर हिलाने वाला है। मैं दो दिन से विचार रहा हूं कि चुनावी कवरेज के वक्त बिहार में मुसहर बस्ती से लेकर तमिलनाडु-तेलंगाना के भीतरी इलाकों में दिखी गरीबी का जो ख्याल बीस-तीस साल पहले बना था वह 21वीं सदी में भी सूखी रोटी और चटनी लिए सैकड़ों-हजारों किलोमीटर पैदल चले चेहरों से कैसे उभरा है। और देखिए इन चेहरों के साथ क्रूरता, बर्बरता, राक्षसी व्यवहार जो कभी तमिलनाड़ु से, कभी कर्नाटक से, कभी गुजरात से खबरें आती हैं कि जा नहीं सकते हो। मानो बंधुआ हों कि भले वायरस से मरो लेकिन जाने नहीं देंगे। काम करो। वे घर लौटना चाहते हैं लेकिन सरकारों को पता है कि यदि वे चले गए तो आर्थिकी चालू नहीं होगी। सरकार भूखी मरेगी, कर्मचारियों को तनख्वाह, पेंशन, भत्ते नहीं दे सकेगी!
सो, भारत राष्ट्र-राज्य का निष्कर्ष है कि केंद्र व राज्य सरकारों के कमर्चारियों की भूख, उनकी पेट भराई के लिए भारत की आर्थिकी है। इस आर्थिकी का चक्का तब चलेगा जब सूखी रोटी और चटनी खाने वाले गरीब, मजदूर (खासकर दिहाड़ी मजदूर) वायरस के बावजूद जान की परवाह न करके फैक्टरी चलवाएं, सड़क बनवाएं, दारू खरीदें। नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप ने, इनकी सरकारों, इनके कुलीन लोगों ने दुनिया से हवाईजहाज के रास्ते भारत में, भारत के राज्यों गुजरात, दिल्ली में वायरस को लिवा कर झुग्गी-झोपड़-गरीब-मध्य वर्ग में पहुंचाया, फिर उनमें पैनिक बनवाया और अब लॉकडाउन में उनके सिर पर डंडा तान दिया है कि वायरस से मरे तो मरे लेकिन आर्थिकी को चलाओ, दिहाड़ी लो, दारू खरीदो और सरकार का पेट भरो!
तर्क-विश्लेषण-विचार विस्तार पा गया है। लेकिन सच कहूं, सूखी रोटी और चटनी के बूते लाखों दिहाड़ी गरीबों का सैकड़ों-हजारों किलोमीटर पैदल चल पड़ना वह हकीकत है, जिसकी इस सदी में कल्पना संभव नहीं थी। भला यह कैसे कि राशन, धर्मादा, जनधन खाते आदि की तमाम बड़ी-बडी बातों के बीच गरीब में तनिक भी भरोसा नहीं है कि दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, सूरत, चेन्नई, हैदराबाद, नागपुर जैसे महानगरों में सरकारों की साक्षात मौजूदगी से वह छह-आठ महीने फंसने पर भी पेट भरता रह सकता है और वायरस से शहरों में सुरक्षा ज्यादा संभव है।

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