रविवार, 10 मई 2020

राजस्थान: हर साल 60 हजार से ज्यादा बच्चों की अकाल मौत, स्टडी में सामने आई बात

जयपुर। राजस्थान  की शिशु मृत्यु दर (IMR) राष्ट्रीय औसत  से ज्यादा है। इसकी जानकारी पिछले साल स्वास्थ्य मंत्रालय के पूरे देश में 30 सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले सिक न्यू-बॉर्न केयर यूनिट  के अध्ययन के दौरान मिली। इस लिस्ट में राजस्थान के तीन यूनिट्स शामिल थे। राजस्थान की शिशु मृत्यु दर (IMR) 2014 के बाद से काफी कम हो गई है। लेकिन 2017 के आंकड़ों के अनुसार, प्रति 1000 जीवित जन्मों में 38 मौतों की अभी भी 33 के राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। साल 2014 में शिशु मृत्यु दर प्रति 1000 जीवित जन्मों में 46 का था, जो कि 17.4 प्रतिशत की दर पर घटा है। हालांकि, राजस्थान में हर साल 16.5 लाख बच्चे जन्म लेते हैं. जबकि 62,843 बच्चों की मौत हो जाती है।

राजस्थान उच्च प्राथमिकता वाले राज्य में शामिल

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान देश के कुल शिशु मृत्यु दर में 8 प्रतिशत का योगदान कर रहा है। इसी कारण राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत शिशु मृत्यू दर को कम करने के लिए हो रह प्रयास में राजस्थान उच्च प्राथमिकता वाले राज्य में शामिल है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अधिकतम शिशु मृत्यु दर वाले राज्यों में अरुणाचल प्रदेश (42), मध्य प्रदेश (47), असम (44), उत्तर प्रदेश(41), मेघालय (39) और ओडिशा (41) शामिल हैं।

देश के हर जिले में नवजात की ऐसे होती है देखभाल


देश के हर राज्य के प्रत्येक जिले में कम से कम एक विशेष नवजात देखभाल इकाई (SNCU) है। जहां 28 दिनों की आयु वाले नवजात शिशुओं की देखभाल की जाती है। देश में शिशु मृत्यु दर को नियंत्रित करने की योजना का ये एक अभिन्न हिस्सा हैं। पिछले साल, जब स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश में 30-सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले एसएनसीयू का आकलन किया, तो राजस्थान के तीन एसएनसीयू इस लिस्ट में शामिल थे। हालांकि इस लिस्ट में कोटा का जे के लोन हॉस्पिटल शामिल नहीं था। जहां पिछले एक महीने में लगभग 100 नवजात शिशुओं की मौत हो गई।

अधिकारियों ने किया था दौरा

स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, 'पिछले साल हमने एसएनसीयू से संबंधित डेटा का विश्लेषण किया और सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले सेंटर का दौरा किया। राजस्थान से तीन एसएनसीयू उस लिस्ट में थे।' इस दौरान अधिकारियों ने कोटा के जेके लोन हॉस्पिचल के कमियों की जानकारी ली। अधिकारी का कहना है कि यह भी एक सच्चाई है कि एसएनसीयू (विशेष तौर पर मेडिकल कॉलेजों से जुड़े हुए) में ज्यादा बीमार बच्चे मिलते हैं।  

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