सोमवार, 1 जुलाई 2019

डॉक्टर वही करें, जिसके लिए बनना तय किया था

डॉर्क्‍टस डे पर विशेष :  भारत के महान चिकित्सक डॉ बिधान चंद्र रॉय के चिकित्सा जगत में उल्लेखनीय योगदान के लिए श्रद्धांजलि स्वरूप उनकी जयंती व पुण्यतिथि दिवस 1 जुलाई को नेशनल डॉक्टर्स डे के रूप में मनाने की परंपरा है। 
चिकित्सक का दर्जा  हमेशा ईश्वर के बाद माना जाता है। यह संबंध युग–युगांतर तक चलता रहेगा। ईश्वर के मुख्य दो गुण होते हैं- सबका भला और किसी का नुकसान नहीं करना। व्यक्ति ईश्वर को सिर्फ उन परिस्थितियों में याद करता है– जब वह कष्ट में हो या दर्द से पीड़ित हो। चिकित्सा शास्त्र की नीति है मरीज के कष्टों को कम करना और उसके दुखों को कम करना। चिकित्सक का काम भी आपातकालीन परिस्थितियों में कष्टों को कम करना ही है। 

कोई भी मरीज चिकित्सक के पास में इमरजेंसी या आपातकालीन परिस्थिति में इसलिए आता है कि अफोर्डेबल तरीके से उसके दर्द का निवारण हो, इसलिए इमरजेंसी सर्विस का व्यवसायीकरण नहीं होना चाहिए। यही व्यवसायीकरण मरीज और चिकित्सक के बीच असंतोष का बड़ा कारण बनता है। जब मरीज और उसके परिजनों की अपेक्षा पूरी नहीं होती, तब क्रोध और हिंसा जन्म लेती है।

भगवद्गीता अध्याय 2, श्लोक 62 में भी यही बात भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि जब किसी की अपेक्षा पूरी नहीं होगी, क्रोध उत्पन्न होगा –

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।2.62।।

जब निजी क्षेत्र में आपातकालीन सेवाओं का व्यवसायीकरण नहीं था, हिंसा की घटनाएं सुनने में नहीं आती थीं। चिकित्सा के व्यवसायीकरण का मुख्य कारण है सरकारी संस्थानों में चिकित्सीय सेवाओं की कमी और अस्पष्ट नीति। 

सरकारी अस्पतालों में निजी अस्पतालों से वेंटीलेटर पर रेफर हुए मरीज को न भर्ती करना, अपने संस्थान के अलावा प्राइवेट अस्पताल में पैदा होनेवाले नवजात शिशु के लिए नर्सरी उपलब्ध न होना, पहले से पंजीकृत गर्भवती महिला का इमरजेंसी सिजेरियन ऑपरेशन न करना, बीमार मरीज को एक्यूट टर्मिनल केयर के लिए नहीं लेना आदि कई कारण हैं, जिनसे असंतोष पैदा होता है।

सरकारी अस्पतालों में हार्ट अटैक वाले मरीजों के लिए आइसीयू में अक्सर 8 बेड्स होते हैं, बाकी के मरीजों का ज्यादातर इलाज इमरजेंसी विभाग में ही किया जाता है। यदि मरीज के रिश्तेदार इमरजेंसी विभाग में ही इलाज करवाने के लिए तैयार नहीं होते, तो उन्हें दूसरे सरकारी अस्पताल के लिए रेफ़र कर दिया जाता है। वहां भी अक्सर यही हालात होते हैं। 

इस समय परिजनों के पास दो विकल्प होते हैं- या तो वह इमरजेंसी विभाग में ही इलाज करवाये या किसी प्राइवेट अस्पताल में जाकर 2-3 लाख रुपये खर्च करे। इस स्थिति में बेचारा डॉक्टर मरीज के परिजनों का कोपभाजन बन जाता है।

दिल्ली में दो बड़े ट्रॉमा सेंटर्स हैं, जहां एक्सीडेंट वाले मरीजों का इमरजेंसी इलाज होता है। केवल ट्रॉमा सेंटर होने की वजह से यहां बेड्स की संख्या पर्याप्त है और ट्रॉमा केसेस में विवाद सुनने में नहीं आता। पर हर राज्य में ट्रॉमा सेंटर न होने के कारण मरीज के रिश्तेदारों और डॉक्टर्स के बीच हिंसा की घटनाएं अक्सर पढ़ने-सुनने को मिल जाती हैं।

सरकारी संस्थानों की इन नकारात्मक नीतियों के कारण निजी क्षेत्रों ने चिकित्सा सेवाओं को अत्यधिक महंगा करके आम जनता की पहुंच के बाहर कर दिया है। यह सही नहीं है। समय है हम जागें और इमरजेंसी में मरीज और उसके परिजनों का शोषण न होने दें। डॉक्टर कर्तव्य है कि   इमरजेंसी चिकित्सा का व्यवसायीकरण न होने दें। 

हाल ही में अमेरिका का एक शोध आया है, जिसमें यह देखा गया है कि हॉस्पिटल के नॉन डॉक्टर सीइओ की सैलरी करोड़ों में होती है। उसके अलावा मार्केटिंग डिपार्टमेंट के ऊपर बहुत ज्यादा खर्चा किया जाता है। अगर हम वाकई में अफोर्डेबल हेल्थ केयर चाहते हैं, तो हमें अस्पताल चलाने के लिए बड़े-बड़े सीइओ क्यों चाहिए? क्यों नहीं डॉक्टर अस्पताल चलाते हैं? हमें अस्पताल चलाने के लिए पेशेंट के पीछे क्यों भागना पड़ रहा है। 

अगर आपकी नीयत और अस्पताल अच्छा है, तो पेशेंट अपने आप आयेंगे। डॉक्टरों को तो वैसे भी एडवरटाइजिंग और ब्रांडिंग की न आवश्यकता है, न ही उन्हें इसकी अनुमति है। आज समय है कि जब भी मरीज आपातकाल में  दर्द या पीड़ा लेकर आता है, तो हम उसका इलाज फौरन बिना भेदभाव और अफोर्डेबल तरीके से करें और वही काम करें, जिसके लिए आप डॉक्टर बनना तय किया था।


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