गुजरे कुछ वर्षों में भारत में मीडिया की भूमिका पर गंभीर सवाल उठे हैं। ये धारणा बनी है कि अनेक मीडिया घराने सत्ताधारी पार्टी के मुखपत्र की तरह काम कर रहे हैं। हाल में हुए लोक सभा चुनाव में सत्ताधारी पार्टी को मिली बड़ी जीत के पीछे मुख्यधारा मीडिया द्वारा बनाए गए एक खास तरह के नैरेटिव की प्रमुख भूमिका मानी गई है। यह बात विपक्षी नेता भी महसूस कर रहे हैं। बीते हफ्ते लोक सभा में तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने सरकार द्वारा बीते पांच वर्षों में प्रत्येक मीडिया हाउस को दिए विज्ञापनों का ब्योरा देने की मांग उठाई। मोइत्रा ने कहा कि करदाताओं को पता होना चाहिए कि उनका पैसा कहां खर्च हो रहा है। इससे पहले कांग्रेस के सदन के नेता अधीर रंजन चौधरी ने भी लोकसभा मौजूदा सरकार पर मीडिया को दबाने के आरोप लगाया था।
कहा था कि सरकार से सवाल पूछने वाले सभी मीडिया समूहों को सरकार विज्ञापन नहीं देकर उन पर दबाव बनाने की कोशिश करती है। इसी मुद्दे को आगे बढ़ाते हुए महुआ ने अपनी बात सदन में रखी। पूछा कि सरकार प्रत्येक मीडिया समूहों को कितने फीसदी विज्ञापन देती है। साथ ही ये भी कि कौन-कौन से प्रिंट मीडिया समूहों को विज्ञापन नहीं दिए जाते हैं। महुआ मोईत्रा के सवाल पर सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं आया। इसकी वजह यह रही कि शून्यकाल के दौरान पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देना सरकार के लिए अनिवार्य नहीं होता है।
महुआ मोइत्रा ने जोर दिया कि 5,246 करोड़ रुपये का आंकड़ा विज्ञापनों पर केवल केंद्र सरकार के खर्च को दिखाता है। इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों द्वारा किया गया खर्च शामिल नहीं है, जो कि काफी बड़ा हिस्सा है। सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों द्वारा खर्च किया गया पैसा करदाताओं का पैसा है। ऐसे में हमें पता होना चाहिए कि सरकार विज्ञापनों पर कुल कितना खर्च करती है। सदन में इस बात का जिक्र किया गया कि देश के पांच प्रमुख मीडिया संस्थान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से केवल एक व्यक्ति द्वारा संचालित हैं। वो भारत का सबसे अमीर व्यक्ति है।
वो सबसे बड़ी दूरसंचार कंपनी के बोर्ड में शामिल है। मगर इसके बाद महुआ मोइत्रा को अपनी बात आगे नहीं बढ़ाने दिया गया। यानी जो सवाल उठे उनका जवाब किसी ने नहीं दिया। मगर ये सवाल देश के जागरूक जन मानस में हैं। इनका अनुत्तरित रहना लोकतंत्र के हित में नहीं है।


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