मंगलवार, 4 जून 2019

नयी शिक्षा नीति के मसौदे से हिंदी की अनिवार्यता समाप्त

नयी शिक्षा नीति के मसौदे को सरकार ने आम जनता की राय जानने के लिए जारी कर दिया है। इस मसौदे में सरकार ने संशोधन किया है और त्रिभाषा फार्मूले को लेकर उठे विवाद के बाद केंद्र ने गैर हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी पढ़ाना अनिवार्य किये जाने के विवादित प्रावधान को मसौदे से हटा दिया है और उसके लिए ‘फ्लेक्सिबल’ शब्द का प्रयोग किया है। संशोधित मसौदे में कहा गया है कि जो छात्र पढ़ाई जाने वाली तीन भाषाओं में से एक या अधिक भाषा बदलना चाहते हैं, वे ग्रेड 6 या ग्रेड 7 में ऐसा कर सकते हैं।

सरकार के इस निर्णय का तमिलनाडु में स्वागत हुआ है, द्रमुक और अन्य दलों ने नयी शिक्षा नीति के मसौदे में त्रिभाषा फॉर्मूले का विरोध किया था और आरोप लगाया था कि यह हिंदी भाषा थोपने जैसा है। गौरतलब है कि जून 2017 में नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनाने के लिए एक समिति का गठन किया गया था, जिसके अध्यक्ष वैज्ञानिक डॉक्टर के. कस्तूरीरंगन थे। उन्होंने कहा कि मसौदे में भारतीयता पर जोर दिया गया था कि हिंदी थोपने की कोशिश की गयी थी।

इस मसौदे पर हिंदी और गैर हिंदी भाषी लोगों के बीच बहस छिड़ गयी है, कइयों का ऐसा मानना है कि सरकार के इस फैसले से हिंदी का भविष्य खतरे में आ जायेगा। त्रिभाषा सूत्र में एक मातृभाषा, दूसरी स्कूल की भाषा और तीसरे भाषा के रूप में हिंदी को अनिवार्य किया गया था, जिसे सरकार ने हटा दिया। इस संबंध में अपनी राय देते हुए  रांची विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की अवकाश प्राप्त व्याख्याता माया प्रसाद का कहना है कि यह सरकार का बहुत ही गलत निर्णय है। एक ओर तो सरकार एक राष्ट्रभाषा की वकालत करती है, वहीं दूसरी ओर वह हिंदी के साथ इस तरह का दोयम दर्जे का व्यवहार कर रही है। सरकार के इस निर्णय से हिंदी और बदहाल होगी। मेरा अंग्रेजी या किसी भी अन्य भारतीय भाषाओं से विरोध नहीं है, लेकिन हिंदी का विरोध नहीं होना चाहिए। जब आप त्रिभाषा सूत्र अपनाते हैं, तो हिंदी की अनिवार्यता समाप्त क्यों की जाये। 



सीबीएसई चेन्नई में सेक्शन आफिसर के पद पर कार्यरत निर्मला का कहना है कि हिंदी की अनिवार्यता समाप्त करना सही निर्णय है। किसी को भी कोई भाषा जबरदस्ती नहीं पढ़ाई जा सकती। हमें ज्यादा से ज्यादा भाषा सिखना चाहिए और हमारे प्रदेश में आम लोग हिंदी पढ़ना चाहते हैं, लेकिन यह उनकी मर्जी पर होना चाहिए। जबरदस्ती पढ़ना उचित नहीं है। जहां तक बात हिंदी के भविष्य को लेकर है, तो मुझे नहीं लगता कि इससे कोई फर्क पड़ने वाला है। सभी हिंदी पढ़ना चाहते हैं, इस तरह की बयानबाजी राजनीति से प्रेरित होती है, सच्चाई इसके विपरीत है। 


वहीं सरला बिरला पब्लिक स्कूल में हिंदी की शिक्षिका मुक्ति शाहदेव ने कहा कि सरकार के फैसले से हिंदी और बेचारी हो जायेगी। पहले ही स्कूलों में हिंदी को अंग्रेजी और अन्य भाषाओं से दोयम माना जाता था, अब जबकि अनिवार्यता ही समाप्त हो जायेगी, तो बच्चे हिंदी पढ़ते थे वे भी अब नहीं पढ़ेंगे। सीबीएसई बोर्ड के स्कूलों में हिंदी और संस्कृत में से एक भाषा चयन का विकल्प बच्चों के पास है, चूंकि संस्कृत में नंबर ज्यादा मिलते हैं और पाठ्‌यक्रम भी सीमित है इसलिए बच्चे संस्कृत को प्राथमिकता देते हैं।

गैर हिंदी भाषी लोगों का कहना है कि मातृभाषा के अतिरिक्त अंग्रेजी पढ़ना जरूरी है, आज के समय में अंग्रेजी भाषा की डिमांड है और वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संपर्क का माध्यम है। जबकि हिंदी भाषा का क्षेत्र बहुत सीमित है और इसका उपयोग अपने देश में भी बहुत ज्यादा नहीं है।

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