गुरुवार, 5 सितंबर 2019

डॉ राधाकृष्णन के शैक्षिक मूल्य

सर्वपल्ली डाॅ राधाकृष्णन के व्यक्तित्व व कृतित्व की अब शिक्षक दिवस पर भी ठीक से चर्चा नहीं की जाती, जो उनकी जयंती पर ही मनाया जाता है।  अफसोस है कि शिक्षक दिवस समारोहों में शिक्षकों और शिक्षा की उन दशाओं व दिशाओं पर भी बात नहीं ही होती, जो उन्हें अभीष्ट थीं। 

यों, आज के कठिन समय में उनके दिखाये शैक्षिक मार्ग के अनुसरण और साथ ही प्रख्यात शिक्षाविद, विद्वान वक्ता, कुशल प्रशासक और चतुर राजनयिक के रूप में उन्हें याद करने के अनेक कारण और जरूरतें हैं।  उनमें सबसे बड़ी जरूरत तो यही है कि इसके बगैर उनके शैक्षिक मूल्य हमारी आज की नयी पीढ़ी में स्थानांतरित नहीं हो सकते।    

प्रसंगवश, 13 मई, 1952 को डॉ राधाकृष्णन नवस्वतंत्र देश के पहले उपराष्ट्रपति बने और 14 मई, 1962 से 13 मई, 1967 तक दूसरे राष्ट्रपति का पदभार संभाला।  

उनके राष्ट्रपति रहते हमने चीन व पाकिस्तान से दो-दो विकट युद्ध लड़े और, जवाहरलाल नेहरू व लालबहादुर शास्त्री जैसे प्रधानमंत्रियों को खोया तो इंदिरा गांधी के रूप में पहली महिला प्रधानमंत्री का राज्यारोहण देखा।  एक शिक्षक के रूप में चालीस साल तक की लंबी पारी के बाद वे राष्ट्रपति बने, तो उनके प्रशंसकों ने इच्छा जतायी कि उनके जन्मदिन पांच सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाये।  

उन्होंने इसकी सहर्ष स्वीकृति दे दी कि इससे उनका जन्मदिन व्यक्तिगत नहीं रह जायेगा. आनेवाली पीढ़ियों के निर्माण में शिक्षकों की महती भूमिका के मद्देनजर वे चाहते थे कि लगातार ऐसे जतन हों, जिनसे देश की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं शिक्षक बनने को आगे आयें।  

शिक्षा को वे ज्ञान के प्रति समर्पण और लगातार सीखने की ऐसी प्रवृत्ति के रूप में परिभाषित करते थे, जो करुणा, प्रेम व श्रेष्ठ परंपराओं का विकास करे।  लोकतंत्र उनके निकट हर व्यक्ति की आध्यात्मिक संभावनाओं में यकीन का नाम था।   

महज 21 साल की उम्र में मद्रास प्रेसीडेंसी काॅलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर बनने के बाद उन्होंने अलग-अलग अवसरों पर काशी, कलकत्ता व आॅक्सफोर्ड जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों मंे कुलपति और प्रोफेसर के पदों के गुरुतर दायित्व निभाये।  वे शिक्षक से ज्यादा ऐसे सहृदय दार्शनिक थे, भारतीय संस्कृति, दर्शन व धर्म को लेकर जिसकी स्थापनाएं व मान्यताएं आज भी उनके वक्त जितनी ही समादृत हैं।  

वे कहते थे- मनुष्य ने मछलियों की तरह तैरना और पक्षियों की तरह उड़ना सीख लिया है, लेकिन मनुष्य की तरह धरती पर चलना उसे अब भी सीखना है और एकमात्र दर्शन ही उसे यह सीख दे सकता है।   

राधाकृष्णन दर्शनशास्त्र के उच्चस्तरीय अध्ययन को उत्सुक नहीं थे।  दरअसल, उन्हें अपने पिता सर्वपल्ली वीरास्वामी की, जो एक स्थानीय जमींदार के राजस्व विभाग के कारकुन थे, गरीबी के कारण दर्शन पढ़ना पड़ा, ताकि दर्शनशास्त्र में स्नातक डिग्रीधारी एक रिश्तेदार की पुस्तकें उनके पढ़ने के काम आ जायें।  पर, जब उन्होंने दर्शनशास्त्र में रुचि लेनी शुरू की, तो पीछे मुड़कर नहीं देखा।  अपनी आगे की पढ़ाई के लिए छात्रवृत्तियां तो जुटा ही लीं, मील के कई पत्थर भी गाड़े। 

जैसा कि हम जानते हैं, पांच सितंबर, 1888 को तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के आंध्र प्रदेश की सीमा के निकट स्थित एक गांव में डॉ राधाकृष्णन का जन्म हुआ और गांव में ही प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद 1896 में उन्होंने तिरुपति जाकर मिशन स्कूल में दाखिला लिया। 

चार साल तक वेल्लूर में रहकर शिक्षा पायी और 17 साल की उम्र में मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज के छात्र बने, जहां से 1906 में स्नातक डिग्री के बाद दर्शनशास्त्र में मास्टर डिग्री पायी. उन्होंने ‘द वेदांत एंड इट्स मेटाफिजिकिल प्रीसपोजीशंस’ शीर्षक से अपनी थीसिस लिखी, तो आशंकित थे कि उनके शिक्षक डाॅ अल्फ्रेड जार्ज हाॅग उसे नकार देंगे।  

लेकिन, डाॅ हाॅग ने उनकी थीसिस को सराहा और उसके प्रकाशन का मार्ग प्रशस्त कर दिया।  आगे चलकर राधाकृष्णन अद्वैत वेदांत का अप्रतिम मीमांसक सिद्ध हुए, बल्कि पश्चिमी जगत से भारत के सांस्कृतिक संवाद का सेतु, यानी भारतीय संस्कृति का सहज संवाहक बन गये।  तब उन्होंने भारतीयता की बाबत पश्चिम की भ्रांतियों व भ्रमों को चुन-चुन कर दूर किया. उनकी कृतियां हैं- मुख्य उपनिषद, धम्मपद, सत्य की खोज, उपनिषदों का संदेश और हमारी विरासत।  

प्रसंगवश, इस सबसे पहले 1903 में ही उनका विवाह हो गया था।  उस वक्त वे महज सोलह साल के थे, जबकि पत्नी सिवाकामू महज दस साल की थीं, जो 1956 में उनका साथ छोड़ गयीं।  साल 1928 में कलकत्ता में कांग्रेस के महाधिवेशन के वक्त राधाकृष्णन पहली बार नेहरू से मिले।  

नेहरू ने 14-15 अगस्त, 1947 की मध्य रात्रि अपने नेतृत्व में संवैधानिक संसद के शपथग्रहण से ठीक पहले के ऐतिहासिक संबोधन के लिए भी उन्हें ही चुना।  बाद में नेहरू ने उन्हें विजयलक्ष्मी पंडित का उत्तराधिकारी बनाकर राजनयिक के तौर पर सोवियत संघ भेज दिया, जहां से लौटे तो भारत का उपराष्ट्रपति पद उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। 

लंबे अकादमिक जीवन में उन्हें अनेक सम्मान व पुरस्कार मिले, लेकिन 1954 में मिले देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारतरत्न’ और ‘डाॅक्टर’ की उपाधि को छोड़कर किसी को भी उन्होंने अपनी पहचान से नहीं जोड़ा. साल 1975 में 17 अप्रैल को मद्रास (अब चेन्नई) में उनकी अंतिम सांस के साथ ही हमने इस महान विभूति को खो दिया। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें